अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् |
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || 2||

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam
dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

Audio

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भावार्थ:

भावार्थ : मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम ‘सत्यभाषण’ है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव॥2॥

Translation

The Supreme Divine Personality said: O scion of Bharat, these are the saintly virtues of those endowed with a divine nature—fearlessness, purity of mind, steadfastness in spiritual knowledge, charity, control of the senses, performance of sacrifice, study of the sacred books, austerity, and straightforwardness; non-violence, truthfulness, absence of anger, renunciation, peacefulness, restraint from fault-finding, compassion toward all living beings, absence of covetousness, gentleness, modesty, and lack of fickleness; vigor, forgiveness, fortitude, cleanliness, bearing enmity toward none, and absence of vanity.

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English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda