थारी रे नदियां का ढावा पे खीची राजा Lyrics & Meaning
थारी रे नदियां का ढावा पे खीची राजा Lyrics & Meaning

खीची राजा का अद्भुत युद्ध: एक शौर्य गाथा

यह भजन एक पौराणिक या ऐतिहासिक शूरवीर राजा की वीरता का वर्णन करता है, जो प्रायः गुजराती लोक संस्कृति में लोककथाओं का हिस्सा है। इसकी रचना दुर्गेश कटारा ने की है और इसे मधुबाला चौहान के स्वर में गाया गया है। यह भजन ‘खीची राजा’ की अजेय भावना और युद्धभूमि में उसके अटूट संकल्प को प्रस्तुत करता है। इसकी प्राण वायु लोक भक्ति में निहित है, जहाँ भक्त राजा के शौर्य का गुणगान करते हैं।

भजन का आध्यात्मिक सार

इस भजन का फलश्रुति यह है कि जो भक्त इस भजन को भक्ति भाव से गाता या सुनता है, उसमें निर्भयता का संचार होता है। यह भजन याद दिलाता है कि जीवन संघर्षों से भरा है, और जब सत्य और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया जाता है, तो देवता स्वयं सेना के रूप में साथ देते हैं।

लोक श्रद्धा और महत्व

यह भजन मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में लोकप्रिय है। ग्रामीण परंपराओं में, ऐसे युद्ध गीतों का गायन महोत्सवों या सामूहिक भजन-संध्या में किया जाता है। इसका उद्देश्य युवाओं में साहस और समर्पण की भावना भरना है। यह भक्ति के उस रूप का प्रतीक है जहाँ भगवान या देवता योद्धा के रूप में प्रकट होते हैं।

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भजन के शब्द (हिंदी में)

है थारी रे नदियां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र,
है थारी रे नदी का ढावा पे,
महुगढ वाला लडे छ र,
है वालां लडे छ र,
महुगढ वाला तो लडे छ र।।

है रे आया घोडा कि रे असवारी,
ज्याक राड खचे छ र,
हे राड खचं छ र रण म,
सुरां लड छ र,
थारी रे नदीयां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र।।

है रे बावन फोजेयां कर बीचा म,
ग्यारह भाई लड छ र,
भाई लड छ र रण म,
सुरा लड छ र,
थारी रे नदीयां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र।।

है र टप टप खुन पड र खीचेयां क,
रण म फेर भी लड छ र,
फेर भी लड छ र रण म,
फेर भी लड छ र,
थारी रे नदीयां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र।।

है लडता शीश कटे रे भाईयों का,
धड धड फेर भी लड छ र,
फेर भी लड छ र रण म,
खीची लड छ र,
थारी रे नदीयां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र।।

है रे लडता पाँव कटेया साथेयां का,
कांध बेठ लड छ र,
है बैठ लड छ र,
कान्ध बैठ लड छ र,
थारी रे नदीयां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र।।

है थारी रे नदियां का ढावा पे,
खीची राजा लडे छे र,
है थारी रे नदी का ढावा पे,
महुगढ वाला लडे छ र,
है वालां लडे छ र,
महुगढ वाला तो लडे छ र।।

गायिका – मधुबाला चौहान।
लेखक / प्रेषक – दुर्गेश कटारा।
8769290858

English Transliteration

Hai thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra,
Hai thaari re nadi ka dhaava pe,
Mahugadh wala lade ch ra,
Hai walaan lade ch ra,
Mahugadh wala to lade ch ra..

Hai re aaya ghoda ki re aswaari,
Jyaak raad khache ch ra,
He raad khachan ch ra ran ma,
Suran lad ch ra,
Thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra..

Hai re baawan phojeeya kar beecha ma,
Gyaarah bhai lad ch ra,
Bhai lad ch ra ran ma,
Sura lad ch ra,
Thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra..

Hai ra tap tap khun pad ra khicheya ka,
Ran ma pher bhi lad ch ra,
Pher bhi lad ch ra ran ma,
Pher bhi lad ch ra,
Thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra..

Hai ladta sheesh kate re bhaiyo ka,
Dhad dhad pher bhi lad ch ra,
Pher bhi lad ch ra ran ma,
Khichi lad ch ra,
Thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra..

Hai re ladta paav kateya saatheya ka,
Kaandh betth lad ch ra,
Hai baith lad ch ra,
Kaandh baith lad ch ra,
Thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra..

Hai thaari re nadiyaan ka dhaava pe,
Khichi Raja lade che ra,
Hai thaari re nadi ka dhaava pe,
Mahugadh wala lade ch ra,
Hai walaan lade ch ra,
Mahugadh wala to lade ch ra..

Singer – Madhubala Chauhan.
Writer/Sender – Durgesh Katara.
8769290858

भावार्थ: युद्धभूमि का दृश्य

पहले स्थान में, भक्त गाता है कि “नदियां के ढावा पर” (संभवतः नदी के तट पर) खीची राजा और महुगढ़ के वीर योद्धा टकरा रहे हैं। यह युद्ध की तैयारी और प्रारंभिक घोषणा है।

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दूसरे स्थान में, घोड़ों की टापों और अस्त्रों के शोर (राड) का वर्णन है जो रणभूमि में गूंज रहे हैं। यहाँ देवताओं (सुर) भी युद्ध में सहभागी बताए गए हैं, जो लोककथाओं की विशेषता है।

तीसरे स्थान में, ‘बावन फौजें’ (52 सेनाएं) और ‘ग्यारह भाई’ (11 भाइयों) का उल्लेख है। यह संख्यात्मक विवरण पारंपरिक लोकगीतों में भव्यता प्रदान करता है।

चौथे और पांचवें स्थान में, भजन युद्ध की भीषणता को दर्शाता है—टप-टप रक्त बहना, शीश कटना, लेकिन फिर भी युद्ध करना। यह “शीश कटे पर धड़ रहे” वाले वीर रस का प्रतीक है।

छठे स्थान में, पैर कटने के बाद भी कंधे पर बैठकर लड़ने की बात कही गई है। यह अटूट संकल्प और धर्म के लिए प्राण न्यौछावर कर देने वाली भावना को दर्शाता है।

कब और कैसे करें उच्चारण

यह भजन शक्ति और साहस का आह्वान करता है। इसे निम्नलिखित समय और विधि से करने से आध्यात्मिक लाभ मिलता है:

  • समय: प्रातः सूर्योदय के समय या सायंकाल, जब घर में दीपक जलाया जाता है।
  • पूजन सामग्री: इस भजन के समय लाल फूल (गुड़हल), सिंदूर और घी का दीपक जलाना शुभ माना जाता है, जो शक्ति और रक्षा का प्रतीक है।
  • पुनरावृत्ति: इसे कम से कम 11 बार या 108 बार (माला में) गुनगुनाने से मन में निडरता आती है।

सांस्कृतिक विरासत

इस भजन की धुन में गुजराती लोक संगीत की झंकार है। मधुबाला चौहान की आवाज़ ने इसे लोकप्रिय बनाया है। ऐसे भजन गाँवों में जागरण और मेलों में गाए जाते हैं। यह खीची राजा की लोककथा को जीवित रखता है, जो आज भी नई पीढ़ी को अपनी वीरता से परिचित कराता है।

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