आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌ ॥

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |
आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29||

āśhcharya-vat paśhyati kaśhchid enan
āśhcharya-vad vadati tathaiva chānyaḥ
āśhcharya-vach chainam anyaḥ śhṛiṇoti
śhrutvāpyenaṁ veda na chaiva kaśhchit

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/09/2-29.MP3.mp3

Audio

भावार्थ:

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता॥29॥

Translation

Some see the soul as amazing, some describe it as amazing, and some hear of the soul as amazing, while others, even on hearing, cannot understand it at all.

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/09/2.29.mp3

English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda