तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय: || 18||

naiva tasya kṛitenārtho nākṛiteneha kaśhchana
na chāsya sarva-bhūteṣhu kaśhchid artha-vyapāśhrayaḥ

Audio

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/09/3-18.MP3.mp3

भावार्थ:

उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता॥18॥

Translation

Such self-realized souls have nothing to gain or lose either in discharging or renouncing their duties. Nor do they need to depend on other living beings to fulfill their self-interest

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/09/3.18.mp3

English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda