ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता )यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव: |
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते || 17||

yas tvātma-ratir eva syād ātma-tṛiptaśh cha mānavaḥ
ātmanyeva cha santuṣhṭas tasya kāryaṁ na vidyate

Audio

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/09/3-17.MP3.mp3

भावार्थ:

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है॥17॥

Translation

But those who rejoice in the self, who are illumined and fully satisfied in the self, for them, there is no duty.

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/09/3.17.mp3

English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda