अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह: || 8||

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam
āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

Audio

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/10/13-8.MP3.mp3

भावार्थ:

श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह॥7॥

Translation

Humbleness; freedom from hypocrisy; non-violence; forgiveness; simplicity; service of the Guru; cleanliness of body and mind; steadfastness; and self-control; dispassion toward the objects of the senses; absence of egotism; keeping in mind the evils of birth, disease, old age, and death; non-attachment; absence of clinging to spouse, children, home, and so on; even-mindedness amidst desired and undesired events in life; constant and exclusive devotion toward Me; an inclination for solitary places and an aversion for mundane society; constancy in spiritual knowledge; and philosophical pursuit of the Absolute Truth—all these I declare to be knowledge, and what is contrary to it, I call ignorance.

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/10/13.8.mp3

English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda