अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् |
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते || 15||

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

Audio

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भावार्थ:

जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम ‘यथार्थ भाषण’ है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है ॥1

Translation

Words that do not cause distress, are truthful, inoffensive, and beneficial, as well as the regular recitation of the Vedic scriptures—these are declared as the austerity of speech.

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English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda

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