यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: |
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते || 22||

yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ
samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate

Audio

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भावार्थ:

जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता॥22॥

Translation

Content with whatever gain comes of its own accord, and free from envy, they are beyond the dualities of life. Being equipoised in success and failure, they are not bound by their actions, even while performing all kinds of activities.

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English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda