सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || 15||

sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam
asaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha

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भावार्थ:

वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है॥14॥

Translation

Though He perceives all sense-objects, yet He is devoid of the senses. He is unattached to anything, and yet He is the sustainer of all. Although He is without attributes, yet He is the enjoyer of the three modes of material nature.

English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda

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