द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते || 16||/h2>

dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha
kṣharaḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭa-stho ’kṣhara uchyate

Audio

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/10/15-16.MP3.mp3

भावार्थ:

इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार (गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा प्रकृति के नाम से कहे गए हैं तथा अध्याय 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से कहे गए हैं, उन्हीं दोनों का यहाँ क्षर और अक्षर के नाम से वर्णन किया है) के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है॥16॥

Translation

There are two kinds of beings in creation, the kṣhar (perishable) and the akṣhar (imperishable). The perishable are all beings in the material realm. The imperishable are the the liberated beings.

https://www.bharattemples.com/wp-content/uploads/bt/2020/10/15.16.mp3

English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda