जय जय भैरवी — तांत्रिक स्तुति | लिरिक्स, अर्थ, वीडियो | मैथिली हिम्न
जय जय भैरवी — तांत्रिक स्तुति | लिरिक्स, अर्थ, वीडियो | मैथिली हिम्न

जय जय भैरवी — तांत्रिक स्तुति

एक दुर्लभ और शक्तिशाली मैथिली स्तुति — जो असुरों को काँपने पर मजबूर कर दे, और भक्त के हृदय में आत्मविश्वास, शक्ति और शांति का संचार करे।

▶️ वीडियो: भक्ति वंदना संगीत द्वारा प्रस्तुत — लिरिक्स सहित, आध्यात्मिक भावना के साथ

📜 पूर्ण लिरिक्स (मैथिली में)

चौसर (हर छंद के बाद दोहराएं):
जय-जय भैरवि असुर भयाउनि

छंद 1:
पशुपति भामिनी माया
सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया

छंद 2:
वासर रैनि सबासन शोभित
चरण चन्द्रमणि चूड़ा
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल
कतओ उगिलि कएल कूड़ा

छंद 3:
सामर बरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फुलकोका
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि
लिधुर फेन उठ फोंका

छंद 4:
घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय
हन-हन कर तुअ काता
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरू जनि माता

🕉️ भावार्थ — प्रत्येक पंक्ति का आध्यात्मिक अर्थ

चौसर:
जय-जय भैरवि असुर भयाउनि
→ जय हो भैरवी की, जिनके नाम से असुरों का दिल धड़क उठता है। वे क्रूर नहीं — वे अज्ञान, अहंकार और बुराई का विनाश करके भक्तों की रक्षा करती हैं।

छंद 1:
पशुपति भामिनी माया → शिव (पशुपति) की शक्ति, ब्रह्मांडीय माया की अधिष्ठात्री।
सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि → वे प्राकृतिक, आंतरिक ज्ञान का वरदान देती हैं।
अनुगति गति तुअ पाया → मेरी चाल, मेरा रास्ता, मेरी गति — सब आपके चरणों में समर्पित।

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छंद 2:
वासर रैनि सबासन शोभित → दिन-रात उनका आसन दिव्य तेज से जगमगाता है।
चरण चन्द्रमणि चूड़ा → उनके पैरों में चंद्रमणि की चूड़ियाँ — मन की शांति का प्रतीक।
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल → कितने राक्षसों को उन्होंने मारकर उनका अंतिम श्वास लेने पर मजबूर किया?
कतओ उगिलि कएल कूड़ा → कितनों को उन्होंने अपना विष, पाप, अहंकार उगलने पर मजबूर किया?

छंद 3:
सामर बरन नयन अनुरंजित → बादल जैसी आँखें — मन को मोह लेने वाली।
जलद जोग फुलकोका → वर्षा के बादलों के बीच योगिनी की तरह, जंगली फूलों से सजी।
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि → भयानक, कंपकंपाते होंठ — विनाश से पहले की खामोशी।
लिधुर फेन उठ फोंका → झाग उठता है — ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह।

छंद 4:
घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय → उनकी पायल कितनी बार गर्जन करती है, बादलों की तरह?
हन-हन कर तुअ काता → “हन! हन!” के उच्चारण से वे माया के बंधन काट देती हैं।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक → महाकवि विद्यापति आपके चरणों के सेवक हैं।
पुत्र बिसरू जनि माता → मैं अपने पुत्र को भूल जाऊँ — मानो मैं स्वयं आपकी माँ बन गई हूँ।

⚡ आध्यात्मिक महत्व

यह स्तुति केवल एक गीत नहीं — यह एक तांत्रिक साधना मंत्र है। इसे गाने या सुनने से:

  • नकारात्मक ऊर्जा, भय और बाधाएं दूर होती हैं
  • आंतरिक शक्ति, साहस और आत्म-विश्वास जागता है
  • माता भैरवी की कृपा से मन की अशांति शांत होती है
  • तंत्र साधकों के लिए यह एक शक्तिशाली कवच है

📜 रचयिता — महाकवि विद्यापति

यह पद मिथिला के महान भक्तिकालीन कवि विद्यापति (14वीं-15वीं शताब्दी) की कृति मानी जाती है। विद्यापति ने शिव-शक्ति, प्रेम और भक्ति के अद्भुत पद रचे — जो आज भी लोक और तांत्रिक परंपराओं में गूंजते हैं।

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🙏 आपकी पूजा में शामिल करें

इस स्तुति को अपनी साधना, आरती या ध्यान सत्र में शामिल करें। वीडियो को सेव करें, शेयर करें, और भक्ति का प्रसार करें।

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