दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्यजेत् | स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् || duḥkham ity eva yat karma kāya-kleśha-bhayāt tyajetsa kṛitvā rājasaṁ tyāgaṁ naiva tyāga-phalaṁ labhet भावार्थ: जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके […]
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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन | सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्विको मत: kāryam ity eva yat karma niyataṁ kriyate ‘rjunasaṅgaṁ tyaktvā phalaṁ chaiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ भावार्थ: हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है॥9॥ […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते | त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: || na dveṣhṭy akuśhalaṁ karma kuśhale nānuṣhajjatetyāgī sattva-samāviṣhṭo medhāvī chhinna-sanśhayaḥ भावार्थ: जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है॥10॥ Translation Those who neither avoid disagreeable […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत: | यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते | na hi deha-bhṛitā śhakyaṁ tyaktuṁ karmāṇy aśheṣhataḥyas tu karma-phala-tyāgī sa tyāgīty abhidhīyate भावार्थ: क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है॥11॥ Translation […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम् | भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् || aniṣhṭam iṣhṭaṁ miśhraṁ cha tri-vidhaṁ karmaṇaḥ phalambhavaty atyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvachit भावार्थ: कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट? अनिष्ट और मिश्रित — ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 13
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे | साङ् ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् || pañchaitāni mahā-bāho kāraṇāni nibodha mesānkhye kṛitānte proktāni siddhaye sarva-karmaṇām भावार्थ: हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान॥13॥ Translation O Arjun, […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् | विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् || adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidhamvividhāśh cha pṛithak cheṣhṭā daivaṁ chaivātra pañchamam भावार्थ: इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य: | पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति: || 16 tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥpaśhyaty akṛita-buddhitvān na sa paśhyati durmatiḥ भावार्थ: परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर: | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव: || śharīra-vāṅ-manobhir yat karma prārabhate naraḥnyāyyaṁ vā viparītaṁ vā pañchaite tasya hetavaḥ भावार्थ: मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं॥15॥ Translation These five are the contributory factors for whatever action is […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 17
यस्य नाहङ् कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते || yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyatehatvā ‘pi sa imāl lokān na hanti na nibadhyate भावार्थ: जिस पुरुष के अन्तःकरण में ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, […]
