या स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च | न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी || yayā svapnaṁ bhayaṁ śhokaṁ viṣhādaṁ madam eva chana vimuñchati durmedhā dhṛitiḥ sā pārtha tāmasī भावार्थ: हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण […]
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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 37
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् | तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् | yat tad agre viṣham iva pariṇāme ‘mṛitopamamtat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 36
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ | अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति || sukhaṁ tv idānīṁ tri-vidhaṁ śhṛiṇu me bharatarṣhabhaabhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ cha nigachchhati भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 38
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् || viṣhayendriya-sanyogād yat tad agre ’mṛitopamampariṇāme viṣham iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛitam भावार्थ: जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन: | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् || yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥnidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam भावार्थ: जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है॥ Translation That happiness which covers the nature of the […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: | सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै: || na tad asti pṛithivyāṁ vā divi deveṣhu vā punaḥsattvaṁ prakṛiti-jair muktaṁ yad ebhiḥ syāt tribhir guṇaiḥ भावार्थ: पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप | कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: brāhmaṇa-kṣhatriya-viśhāṁ śhūdrāṇāṁ cha parantapakarmāṇi pravibhaktāni svabhāva-prabhavair guṇaiḥ भावार्थ: हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं॥41॥ Translation The duties of the Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras—are distributed according to their qualities, in accordance with their […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 42
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् || śhamo damas tapaḥ śhauchaṁ kṣhāntir ārjavam eva chajñānaṁ vijñānam āstikyaṁ brahma-karma svabhāva-jam भावार्थ: अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् || śhauryaṁ tejo dhṛitir dākṣhyaṁ yuddhe chāpy apalāyanamdānam īśhvara-bhāvaśh cha kṣhātraṁ karma svabhāva-jam भावार्थ: शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं॥43॥ Translation Valor, strength, fortitude, skill in weaponry, resolve never to […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 44
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || kṛiṣhi-gau-rakṣhya-vāṇijyaṁ vaiśhya-karma svabhāva-jamparicharyātmakaṁ karma śhūdrasyāpi svabhāva-jam भावार्थ: खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना […]
