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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 17

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरै: |अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तै: सात्विकं परिचक्षते || 17|| śhraddhayā parayā taptaṁ tapas tat tri-vidhaṁ naraiḥaphalākāṅkṣhibhir yuktaiḥ sāttvikaṁ parichakṣhate Audio भावार्थ: फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं ॥17॥ Translation When devout persons with ardent faith practice these […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 16

मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: |भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते || 16|| manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥbhāva-sanśhuddhir ity etat tapo mānasam uchyate} Audio भावार्थ: मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है ॥16॥ Translation Serenity of thought, gentleness, silence, self-control, and […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 15

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् |स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते || 15|| anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yatsvādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate Audio भावार्थ: जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम ‘यथार्थ भाषण’ है।) तथा […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 14

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् |ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || 14|| deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavambrahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate Audio भावार्थ: देवता, ब्राह्मण, गुरु (यहाँ ‘गुरु’ शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 13

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् |श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते || 13|| vidhi-hīnam asṛiṣhṭānnaṁ mantra-hīnam adakṣhiṇamśhraddhā-virahitaṁ yajñaṁ tāmasaṁ parichakṣhate Audio भावार्थ: शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं ॥13॥ Translation Sacrifice devoid of faith and contrary to the injunctions of the […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 12

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् |इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् || 12|| abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api chaiva yatijyate bharata-śhreṣhṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam Audio भावार्थ: परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान ॥12॥ Translation […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 11

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते |यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्विक: || 11 aphalākāṅkṣhibhir yajño vidhi-driṣhṭo ya ijyateyaṣhṭavyam eveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ Audio भावार्थ: जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है ॥11॥ Translation Sacrifice that […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 10

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् |उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् || 10|| yāta-yāmaṁ gata-rasaṁ pūti paryuṣhitaṁ cha yatuchchhiṣhṭam api chāmedhyaṁ bhojanaṁ tāmasa-priyam Audio भावार्थ: जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है ॥10॥ Translation Foods that are overcooked, stale, putrid, polluted, […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 9

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिन: |आहारा राजसस्येष्टा दु:खशोकामयप्रदा: || 9|| kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥāhārā rājasasyeṣhṭā duḥkha-śhokāmaya-pradāḥ Audio भावार्थ: कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं ॥9॥ Translation Foods that are too bitter, too sour, salty, very hot, pungent, dry, […]

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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 8

आयु:सत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना: |रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: सात्विकप्रिया: || 8 आयु:सत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना: |रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: सात्विकप्रिया: || 8 Audio भावार्थ: आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव […]