आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय: |यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु || 7|| āhāras tv api sarvasya tri-vidho bhavati priyaḥyajñas tapas tathā dānaṁ teṣhāṁ bhedam imaṁ śhṛiṇu Audio भावार्थ: भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके […]
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Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 6
कर्षयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस: |मां चैवान्त:शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् || 6|| karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥmāṁ chaivāntaḥ śharīra-sthaṁ tān viddhy āsura-niśhchayān Audio भावार्थ: जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं (शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान् के अंशस्वरूप जीवात्मा को […]
Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 5
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जना: |दम्भाहङ्कारसंयुक्ता: कामरागबलान्विता: || 5|| aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥdambhāhankāra-sanyuktāḥ kāma-rāga-balānvitā Audio भावार्थ: जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं ॥5॥ Translation Some people perform stern […]
Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 4
यजन्ते सात्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसा: |प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: || 4|| yajante sāttvikā devān yakṣha-rakṣhānsi rājasāḥpretān bhūta-gaṇānśh chānye yajante tāmasā janāḥ Audio भावार्थ: सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं ॥4॥ Translation Those in the mode of goodness […]
Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 3
सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स: || 3|| sattvānurūpā sarvasya śhraddhā bhavati bhārataśhraddhā-mayo ‘yaṁ puruṣho yo yach-chhraddhaḥ sa eva saḥ Audio भावार्थ: हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है […]
Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 2
श्रीभगवानुवाच |त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा |सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु || 2| śhrī-bhagavān uvāchatri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jāsāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu Audio भावार्थ: श्री भगवान् बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार […]
Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 1
अर्जुन उवाच |ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता: |तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तम: || 1|| arjuna uvāchaye śhāstra-vidhim utsṛijya yajante śhraddhayānvitāḥteṣhāṁ niṣhṭhā tu kā kṛiṣhṇa sattvam āho rajas tamaḥ Audio भावार्थ: –हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्याग कर श्रद्बा से युक्त्त हुए देवादि का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन से […]
Bhagavad Gita: Chapter 16, Verse 24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ |ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || 24|| tasmāch chhāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitaujñātvā śhāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi Audio भावार्थ: इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है॥24॥ Translation Therefore, let the scriptures be your authority […]
Bhagavad Gita: Chapter 16, Verse 23
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: |न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || 23|| yaḥ śhāstra-vidhim utsṛijya vartate kāma-kārataḥna sa siddhim avāpnoti na sukhaṁ na parāṁ gatim Audio भावार्थ: जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख […]
Bhagavad Gita: Chapter 16, Verse 22
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: |आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || 22|| etair vimuktaḥ kaunteya tamo-dvārais tribhir naraḥācharaty ātmanaḥ śhreyas tato yāti parāṁ gatim Audio भावार्थ: हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है (अपने उद्धार के लिए भगवदाज्ञानुसार बरतना ही ‘अपने कल्याण का आचरण करना’ है), इससे वह […]
