वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्तिदंष्ट्राकरालानि भयानकानि |केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषुसन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै: || 27|| vaktrāṇi te tvaramāṇā viśhantidanṣhṭrā-karālāni bhayānakānikechid vilagnā daśhanāntareṣhusandṛiśhyante chūrṇitair uttamāṅgaiḥ Audio भावार्थ: और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों […]
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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 26
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा:सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै: |भीष्मो द्रोण: सूतपुत्रस्तथासौसहास्मदीयैरपि योधमुख्यै: || 26|| amī cha tvāṁ dhṛitarāśhtrasya putrāḥsarve sahaivāvani-pāla-saṅghaiḥbhīṣhmo droṇaḥ sūta-putras tathāsausahāsmadīyair api yodha-mukhyaiḥ Audio भावार्थ: वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण Translation I see all the sons of Dhritarashtra, […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि |दिशो न जाने न लभे च शर्मप्रसीद देवेश जगन्निवास || 25|| danṣhṭrā-karālāni cha te mukhānidṛiṣhṭvaiva kālānala-sannibhānidiśho na jāne na labhe cha śharmaprasīda deveśha jagan-nivāsa Audio भावार्थ: दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 24
नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्माधृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || 24|| nabhaḥ-spṛiśhaṁ dīptam aneka-varṇaṁvyāttānanaṁ dīpta-viśhāla-netramdṛiṣhṭvā hi tvāṁ pravyathitāntar-ātmādhṛitiṁ na vindāmi śhamaṁ cha viṣhṇo Audio भावार्थ: क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरुपादम् |बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्ट्वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम् || 23|| rūpaṁ mahat te bahu-vaktra-netraṁmahā-bāho bahu-bāhūru-pādambahūdaraṁ bahu-danṣhṭrā-karālaṁdṛiṣhṭvā lokāḥ pravyathitās tathāham Audio भावार्थ: हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च |गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे || 22|| rudrādityā vasavo ye cha sādhyāviśhve ’śhvinau marutaśh choṣhmapāśh chagandharva-yakṣhāsura-siddha-saṅghāvīkṣhante tvāṁ vismitāśh chaiva sarve Audio भावार्थ: जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 21
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्तिकेचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति |स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा:स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि: || 21|| amī hi tvāṁ sura-saṅghā viśhantikechid bhītāḥ prāñjalayo gṛiṇantisvastīty uktvā maharṣhi-siddha-saṅghāḥstuvanti tvāṁ stutibhiḥ puṣhkalābhiḥ Audio भावार्थ: वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हिव्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा: |दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् || 20|| dyāv ā-pṛithivyor idam antaraṁ hivyāptaṁ tvayaikena diśhaśh cha sarvāḥdṛiṣhṭvādbhutaṁ rūpam ugraṁ tavedaṁloka-trayaṁ pravyathitaṁ mahātman Audio भावार्थ: हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् |पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं- स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् || 19|| anādi-madhyāntam ananta-vīryamananta-bāhuṁ śhaśhi-sūrya-netrampaśhyāmi tvāṁ dīpta-hutāśha-vaktraṁsva-tejasā viśhvam idaṁ tapantam Audio भावार्थ: आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ॥19॥ Translation You are […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे || 18|| tvam akṣharaṁ paramaṁ veditavyaṁtvam asya viśhvasya paraṁ nidhānamtvam avyayaḥ śhāśhvata-dharma-goptāsanātanas tvaṁ puruṣho mato me Audio भावार्थ: आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और […]
