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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 13

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता: |भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || 13|| mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥbhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam Audio भावार्थ: परंतु हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के (इसका विस्तारपूर्वक वर्णन गीता अध्याय 16 श्लोक 1 से 3 तक में देखना चाहिए) आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस: |राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता: || 12|| moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥrākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ Audio भावार्थ: वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को (जिसको आसुरी संपदा के नाम से विस्तारपूर्वक भगवान ने गीता अध्याय 16 श्लोक 4 तथा श्लोक […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 11

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || 11|| avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritamparaṁ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśhvaram Audio भावार्थ: मेरे परमभाव को (गीता अध्याय 7 श्लोक 24 में देखना चाहिए) न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान्‌ ईश्वर को तुच्छ समझते हैं […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 10

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् |हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || 10|| mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharamhetunānena kaunteya jagad viparivartate Audio भावार्थ: हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है॥10॥ Translation Working under My direction, this material energy brings into being all animate […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 9

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय |उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || 9|| na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjayaudāsīna-vad āsīnam asaktaṁ teṣhu karmasu Audio भावार्थ: हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश (जिसके संपूर्ण कार्य कर्तृत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते हैं उसका नाम ‘उदासीन के सदृश’ है।) […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 8

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || 7|| sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikāmkalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham Audio भावार्थ: अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ॥8॥ Translation O son of Kunti, I manifest them again. Presiding over […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 7

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || 7|| sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikāmkalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham Audio भावार्थ: हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ॥7॥ Translation At the […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 6

यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् |तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || 6|| yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahāntathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya Audio भावार्थ: जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान॥6॥ Translation Know that as […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 5

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् |भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन: || 5|| na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwarambhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ Audio भावार्थ: वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी […]

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Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 4

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना |मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: || 4|| mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtināmat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ Audio भावार्थ: मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ॥4॥ […]