स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते |लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् || 22|| sa tayā śhraddhayā yuktas tasyārādhanam īhatelabhate cha tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān Audio भावार्थ: वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह […]
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Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 21
यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति |तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् || 21|| yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhatitasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham Audio भावार्थ: जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ॥21॥ […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता: |तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया || 20|| kāmais tais tair hṛita-jñānāḥ prapadyante ’nya-devatāḥtaṁ taṁ niyamam āsthāya prakṛityā niyatāḥ svayā Audio भावार्थ: उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं॥20॥ […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: || 19|| bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyatevāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ Audio भावार्थ: बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है॥19॥ Translation After many births […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 18
उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् || 18|| udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matamāsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṁ gatim Audio भावार्थ: ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है- ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते |प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: || 17|| teṣhāṁ jñānī nitya-yukta eka-bhaktir viśhiṣhyatepriyo hi jñānino ’tyartham ahaṁ sa cha mama priyaḥ Audio भावार्थ: उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 16
चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन |आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || 16|| chatur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛitino ’rjunaārto jijñāsur arthārthī jñānī cha bharatarṣhabha Audio भावार्थ: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 15
न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: |माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: || 15|| na māṁ duṣhkṛitino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥmāyayāpahṛita-jñānā āsuraṁ bhāvam āśhritāḥ Audio भावार्थ: माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते॥15॥ Translation Four kinds of people do not […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || 14|| daivī hyeṣhā guṇa-mayī mama māyā duratyayāmām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te Audio भावार्थ: क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन […]
Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत् |मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् || 13|| tribhir guṇa-mayair bhāvair ebhiḥ sarvam idaṁ jagatmohitaṁ nābhijānāti māmebhyaḥ param avyayam Audio भावार्थ: गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता॥13॥ […]
