सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते || 9|| suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhusādhuṣhvapi cha pāpeṣhu sama-buddhir viśhiṣhyate Audio भावार्थ: सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है॥9॥ Translation The yogis look upon all—well-wishers, […]
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Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय: |युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन: || 8|| jñāna-vijñāna-tṛiptātmā kūṭa-stho vijitendriyaḥyukta ityuchyate yogī sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ Audio भावार्थ: जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है॥8॥ Translation The yogi […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 7
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित: |शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो: || 7|| jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥśhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ Audio भावार्थ: सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 6
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित: |अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्ते तात्मैव शत्रुवत् || 6|| bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥanātmanas tu śhatrutve vartetātmaiva śhatru-vat Audio भावार्थ: जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: || 5|| uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayetātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ Audio भावार्थ: अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥5॥ Translation Elevate yourself through the power of […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते || 4|| yadā hi nendriyārtheṣhu na karmasv-anuṣhajjatesarva-saṅkalpa-sannyāsī yogārūḍhas tadochyate Audio भावार्थ: जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है॥4॥ Translation When one is neither attached to sense objects […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते |योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते || 3|| ārurukṣhor muner yogaṁ karma kāraṇam uchyateyogārūḍhasya tasyaiva śhamaḥ kāraṇam uchyate Audio भावार्थ: योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 2
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन || 2|| yaṁ sannyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍavana hyasannyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaśhchana Audio भावार्थ: हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक […]
Bhagavad Gita: Chapter 6, Verse 1
श्रीभगवानुवाच |अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य: |स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: || 1|| śhrī bhagavān uvāchaanāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥsa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ Audio भावार्थ: श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है […]
Bhagavad Gita: Chapter 5, Verse 29
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् |सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति || 29|| bhoktāraṁ yajña-tapasāṁ sarva-loka-maheśhvaramsuhṛidaṁ sarva-bhūtānāṁ jñātvā māṁ śhāntim ṛichchhati Audio भावार्थ: मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद् अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता […]
