अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति |सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा: || 30|| apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣhu juhvatisarve ’pyete yajña-vido yajña-kṣhapita-kalmaṣhāḥ Audio भावार्थ: अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं॥30॥ Translation Yet others curtail their […]
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Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 29
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे |प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: || 29|| apāne juhvati prāṇaṁ prāṇe ’pānaṁ tathāpareprāṇāpāna-gatī ruddhvā prāṇāyāma-parāyaṇāḥ Audio भावार्थ: दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार (गीता अध्याय 6 श्लोक 17 […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 28
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे |स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता: || 28|| dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpareswādhyāya-jñāna-yajñāśh cha yatayaḥ sanśhita-vratāḥ Audio भावार्थ: कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसादि तीक्ष्णव्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं॥28॥ Translation […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 27
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे |आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते || 27|| sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi chāpareātma-sanyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite Audio भावार्थ: दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं (सच्चिदानंदघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का भी न चिन्तन करना ही उन सबका हवन करना […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 26
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति |शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति || 26|| śhrotrādīnīndriyāṇyanye sanyamāgniṣhu juhvatiśhabdādīn viṣhayānanya indriyāgniṣhu juhvati Audio भावार्थ: अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं॥26॥ Translation Others offer hearing and other senses in […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिन: पर्युपासते |ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति || 25|| daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsatebrahmāgnāvapare yajñaṁ yajñenaivopajuhvati Audio भावार्थ: दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। (परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना || 24|| brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutambrahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā Audio भावार्थ: जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 23
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस: |यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते || 23|| gata-saṅgasya muktasya jñānāvasthita-chetasaḥyajñāyācharataḥ karma samagraṁ pravilīyate Audio भावार्थ: जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 22
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: |सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते || 22|| yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥsamaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate Audio भावार्थ: जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और […]
Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 21
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह: |शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 21|| nirāśhīr yata-chittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥśhārīraṁ kevalaṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham Audio भावार्थ: जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता॥21॥ Translation Free […]
