यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |
वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42||

yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ
veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ

Audio

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भावार्थ:

हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं,

Translation

Those with limited understanding, get attracted to the flowery words of the Vedas, which advocate ostentatious rituals for elevation to the celestial abodes, and presume no higher principle is described in them.

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English Translation Of Sri Shankaracharya’s Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda