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Ganga Chalisa.. Jai Jagjanani Haran By Anuradha Paudwal [Full Song] I Ganga Maa

• Updated: Nov 29, 2019
Ganga Chalisa, Ganga Chalisa.. Jai Jagjanani Haran By Anuradha Paudwal [Full Song] I Ganga Maa
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Ganga Chalisa.. Jai Jagjanani Haran By Anuradha Paudwal [Full Song] I Ganga Maa

|| दोहा ||

 जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग ।

जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग  ।

॥ चौपाई ॥

जय जग जननि हरण अघ खानी , आनन्द करनि गंग महारानी ।

 जय भागीरथि सुरसरि माता , कलिमल मूल दलनि विख्याता ।

जय जय जय हनु सुता अघ हननी , भीषम की माता जग जननी ।

 धवल कमल दल मम तनु साजे , लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे । ।

वाहन मकर विमल शुचि सोहै , अमिय कलश कर लखि मन मोहै ।

जडित रत्न कंचन आभूषण , हिय मणि हार , हरणि तम दूषण । ।

जग पावनि त्रय ताप नसावनि , तरल तरंग तंग मन भावनि । ।

जो गणपति अति पूज्य प्रधाना , तिहुँ ते प्रथम गंग अस्नाना ।

ब्रह्म कमण्डल वासिनि देवी , श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी ।

 साठि सहस्र सगर सुत तारयो , गंगा सागर तीरथ धारयो ।

अगम तरंग उठयो मन भावन , लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन ।

 तीरथ राज प्रयाग अझैवट , धरयौ मातु पुनि काशी करवट ।

 धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी , तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी ।

भागीरथ तप कियो अपारा , दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा ।

जब जग जननी चल्यो हहराई , शंभु जटा महँ रह्यो समाई ।

 वर्ष पर्यन्त गंग महारानी , रहीं शंभु के जटा भुलानी ।

मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो , तब इक बून्द जटा से पायो ।

 ताते मातु भई त्रय धारा , . मृत्यु लोक नभ अरु पातारा ।

 गई पाताल प्रभावति नामा , मन्दाकिनी गई गगन ललामा ।
मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि ,कलिमल हरणि अगम जग पावनि |

 धनि मइया तव महिमा भारी , धर्म धुरि कलि कलुष कुठारी ।

मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी , धनि सुरसरित सकल भयनासिनी ।

 पान करत निर्मल गंगा जल , पावत मन इच्छित अनन्त फल ।

 पूरब जन्म पुण्य जब जागत , तबहिं ध्यान गंगा महं लागत । ।

 जई पगु सुरसरि हेतु उठावहि , तड़ जगि अश्वमेध फल पावहि ।

महा पतित जिन काहु न तारे , तिन तारे इक नाम तिहारे ।

शत योजनहू से जो ध्यावहिं , निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं ।

 नाम भजत अगणित अर्घ नाशै , विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै ।

 जिमि धन मूल धर्म अरु दाना , धर्म मूल गंगाजल पाना ।

 तव गुण गुणन करत दुःख भाजत , गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ।

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत , दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत ।

 बुद्धिहीन विद्या बल पावै , रोगी रोग मुक्त है जावे ।

गंगा गंगा जो नर कहहीं , भूखे नंगे कबहुँ न रहहीं ।

श्री गंगा घालो निकसत ही मुख गंगा माई , श्रवण दाबि यम चलहिं पराई ।

 महाँ अधिन अधमन कहँ तारें , भए नर्क के बन्द किवारे ।

जो नर जपै गंग शत नामा , सकल सिद्ध पूरण वे कामा ।

सब सुख भोग परम पद पावहिं , आवागमन रहित है जावहिं ।

धनि मइया सुरसरि सुखदैनी , धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी । ।

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा , सुन्दरदास गंगा कर दासा ।

 जो यह पढ़े गंगा चालीसा , मिलै भक्ति अविरल वागीसा ।

 । । दोहा । ।

 नित नव सुख सम्पति लहैं , धेरै , गंग का ध्यान ।

अन्त समय सुरपुर बसै  , सादर बैठि विमान  । ।

 सम्वत् भुज नभ दिशि , राम जन्म दिन चैत्र ।

 पूरण चालीसा कियो , हरि भक्तन हित नैत्र । ।

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