यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: |भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || 13|| yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥbhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt Audio भावार्थ: यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो […]
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Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता: |तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स: || 12|| iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥtair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ Audio भावार्थ: यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 10
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: |अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् || 10|| saha-yajñāḥ prajāḥ sṛiṣhṭvā purovācha prajāpatiḥanena prasaviṣhyadhvam eṣha vo ’stviṣhṭa-kāma-dhuk Audio भावार्थ: प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 11
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व: |परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ || 11|| devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥparasparaṁ bhāvayantaḥ śhreyaḥ param avāpsyatha Audio भावार्थ: तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 9
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: |तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर || 9|| yajñārthāt karmaṇo ’nyatra loko ’yaṁ karma-bandhanaḥtad-arthaṁ karma kaunteya mukta-saṅgaḥ samāchara Audio भावार्थ: यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: |शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: || 8|| niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥśharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ Audio भावार्थ: तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा॥8॥ Translation You […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 7
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन |कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते || 7|| yas tvindriyāṇi manasā niyamyārabhate ’rjunakarmendriyaiḥ karma-yogam asaktaḥ sa viśhiṣhyate Audio भावार्थ: किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है॥7॥॥ Translation But those karm yogis who control their knowledge senses […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 6
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् |इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते || 6|| karmendriyāṇi sanyamya ya āste manasā smaranindriyārthān vimūḍhātmā mithyāchāraḥ sa uchyate Audio भावार्थ: जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥6॥ Translation जो […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5|| na hi kaśhchit kṣhaṇam api jātu tiṣhṭhatyakarma-kṛitkāryate hyavaśhaḥ karma sarvaḥ prakṛiti-jair guṇaiḥ Audio भावार्थ: निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए […]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते |न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति || 4|| na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnutena cha sannyasanād eva siddhiṁ samadhigachchhati Audio भावार्थ: मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम ‘निष्कर्मता’ […]
