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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 17

काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ: | धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: || 17|| kāśhyaśhcha parameṣhvāsaḥ śhikhaṇḍī cha mahā-rathaḥdhṛiṣhṭadyumno virāṭaśhcha sātyakiśh chāparājitaḥ भावार्थ: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए॥16॥ष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी […]

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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 16

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: | नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ || 16|| anantavijayaṁ rājā kuntī-putro yudhiṣhṭhiraḥnakulaḥ sahadevaśhcha sughoṣha-maṇipuṣhpakau भावार्थ: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए॥16॥ष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र […]

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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 6

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् | सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: || yudhāmanyuśhcha vikrānta uttamaujāśhcha vīryavānsaubhadro draupadeyāśhcha sarva eva mahā-rathāḥ भावार्थ: इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, […]

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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 5

धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् | पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैयश्च नरपुङ्गव: | dhṛiṣhṭaketuśhchekitānaḥ kāśhirājaśhcha vīryavānpurujit kuntibhojaśhcha śhaibyaśhcha nara-puṅgavaḥ भावार्थ: इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, […]

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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 4

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधियुयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: || atra śhūrā maheṣhvāsā bhīmārjuna-samā yudhiyuyudhāno virāṭaśhcha drupadaśhcha mahā-rathaḥ भावार्थ: इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 6

Chapter 2, Verse 6 न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || 2.6 || na chaitadvidmaḥ kataranno garīyoyadvā jayema yadi vā no jayeyuḥyāneva hatvā na jijīviṣhāmaste ’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣhṭrāḥ भावार्थ: हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 5

Chapter 2, Verse 5 गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || 2.5 || gurūnahatvā hi mahānubhāvānśhreyo bhoktuṁ bhaikṣhyamapīha lokehatvārtha-kāmāṁstu gurūnihaivabhuñjīya bhogān rudhira-pradigdhān भावार्थ: इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 4

Chapter 2, Verse 4 अर्जुन उवाच | कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन | इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || 4|| arjuna uvāchakathaṁ bhīṣhmam ahaṁ sankhye droṇaṁ cha madhusūdanaiṣhubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvari-sūdana भावार्थ: अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 3

Chapter 2, Verse 3 क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्तवय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || 3|| klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayyupapadyatekṣhudraṁ hṛidaya-daurbalyaṁ tyaktvottiṣhṭha parantapa भावार्थ: इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 2

Chapter 2, Verse 2 श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || 2.2 || śhrī bhagavān uvāchakutastvā kaśhmalamidaṁ viṣhame samupasthitamanārya-juṣhṭamaswargyam akīrti-karam arjuna भावार्थ: श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और […]