पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङक्ते प्रकृतिजान्गुणान् |कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || 22|| puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇānkāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu Audio भावार्थ: प्रकृति में (प्रकृति शब्द का अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए) स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों […]
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Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 21
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते |पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते || 21|| kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyatepuruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate Audio भावार्थ: कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम ‘कार्य’ है) और करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 20
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि |विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || 20|| prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv apivikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān Audio भावार्थ: कृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान॥19॥ Translation Know that prakṛiti (material […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 19
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत: |मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते || 19|| iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥmad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate Audio भावार्थ: इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 18
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते |ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || 18|| jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyatejñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam Audio भावार्थ: वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिए) एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 17
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् |भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || 17|| avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitambhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha Audio भावार्थ: वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च |सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || 16|| bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva chasūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat} Audio भावार्थ: वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 15
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || 15|| sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitamasaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha Audio भावार्थ: वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है॥14॥ […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 14
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् |सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || 14|| sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukhamsarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati Audio भावार्थ: वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 13
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्रुते |अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || 13|| jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnuteanādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate Audio भावार्थ: जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही॥12॥ Translation I […]
