क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत |क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || 3|| kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhāratakṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama Audio भावार्थ: हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान (गीता अध्याय 15 श्लोक 7 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित […]
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Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 2
श्रीभगवानुवाच |इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद: || 2|| śhrī-bhagavān uvāchaidaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyateetad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ Audio भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर ‘क्षेत्र’ (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 20
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते |श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया: || 20|| ye tu dharmyāmṛitam idaṁ yathoktaṁ paryupāsateśhraddadhānā mat-paramā bhaktās te ’tīva me priyāḥ Audio भावार्थ: परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम ‘श्रद्धा’ है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 19
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् |अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नर: || 19|| samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥśhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ Audio भावार्थ: जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 18
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: |शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: सङ्गविवर्जित: || 18|| samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥśhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ Audio भावार्थ: जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है॥18॥ Translation Those, who are alike to friend and foe, equipoised […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ् क्षति |शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: || 17|| yo na hṛiṣhyati na dveṣhṭi na śhochati na kāṅkṣhatiśhubhāśhubha-parityāgī bhaktimān yaḥ sa me priyaḥ Audio भावार्थ: जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 16
अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ: |सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 16|| anapekṣhaḥ śhuchir dakṣha udāsīno gata-vyathaḥsarvārambha-parityāgī yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ Audio भावार्थ: जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य: |हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय: || 15|| yasmān nodvijate loko lokān nodvijate cha yaḥharṣhāmarṣha-bhayodvegair mukto yaḥ sa cha me priyaḥ Audio भावार्थ: जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 14
सन्तुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय: |मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय: || 14|| santuṣhṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛiḍha-niśhchayaḥmayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ Audio भावार्थ: मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥14॥ Translation They are ever-contented, […]
Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 13
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च |निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी || 13|| adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva chanirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī Audio भावार्थ: जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान […]
