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Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 2

श्रीभगवानुवाच |मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते |श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: || 2|| śhrī-bhagavān uvāchamayy āveśhya mano ye māṁ nitya-yuktā upāsateśhraddhayā parayopetās te me yuktatamā matāḥ Audio भावार्थ: श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर […]

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Bhagavad Gita: Chapter 12, Verse 1

अर्जुन उवाच |एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते |ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: || 1|| arjuna uvāchaevaṁ satata-yuktā ye bhaktās tvāṁ paryupāsateye chāpy akṣharam avyaktaṁ teṣhāṁ ke yoga-vittamāḥ Audio भावार्थ: अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 55

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्त: सङ्गवर्जित: |निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव || 55|| mat-karma-kṛin mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥnirvairaḥ sarva-bhūteṣhu yaḥ sa mām eti pāṇḍava Audio भावार्थ: हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 54

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप || 54|| bhaktyā tv ananyayā śhakya aham evaṁ-vidho ’rjunajñātuṁ draṣhṭuṁ cha tattvena praveṣhṭuṁ cha parantapa Audio भावार्थ: परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति (अनन्यभक्ति का भाव अगले श्लोक में विस्तारपूर्वक कहा है।) के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 53

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया |शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा || 53|| nāhaṁ vedair na tapasā na dānena na chejyayāśhakya evaṁ-vidho draṣhṭuṁ dṛiṣhṭavān asi māṁ yathā Audio भावार्थ: जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है- इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 52

श्रीभगवानुवाच |सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम |देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिण: || 52|| śhrī-bhagavān uvāchasu-durdarśham idaṁ rūpaṁ dṛiṣhṭavān asi yan mamadevā apy asya rūpasya nityaṁ darśhana-kāṅkṣhiṇaḥ Audio भावार्थ: श्री भगवान बोले- मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात्‌ इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 51

अर्जुन उवाच |दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत: || 51|| arjuna uvāchadṛiṣhṭvedaṁ mānuṣhaṁ rūpaṁ tava saumyaṁ janārdanaidānīm asmi saṁvṛittaḥ sa-chetāḥ prakṛitiṁ gataḥ Audio भावार्थ: अर्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ॥51॥ […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 50

सञ्जय उवाच |इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वास्वकं रूपं दर्शयामास भूय: |आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुन: सौम्यवपुर्महात्मा || 50|| sañjaya uvāchaity arjunaṁ vāsudevas tathoktvāsvakaṁ rūpaṁ darśhayām āsa bhūyaḥāśhvāsayām āsa cha bhītam enaṁbhūtvā punaḥ saumya-vapur mahātmā Audio भावार्थ: संजय बोले- वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 49

मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् |व्यपेतभी: प्रीतमना: पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य || 49|| mā te vyathā mā cha vimūḍha-bhāvodṛiṣhṭvā rūpaṁ ghoram īdṛiṅ mamedamvyapeta-bhīḥ prīta-manāḥ punas tvaṁtad eva me rūpam idaṁ prapaśhya Audio भावार्थ: मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़भाव भी नहीं होना […]

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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 48

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: |एवंरूप: शक्य अहं नृलोकेद्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर || 48|| na veda-yajñādhyayanair na dānairna cha kriyābhir na tapobhir ugraiḥevaṁ-rūpaḥ śhakya ahaṁ nṛi-lokedraṣhṭuṁ tvad anyena kuru-pravīra Audio भावार्थ: हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से […]