मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम् |कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || 9|| mach-chittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparamkathayantaśh cha māṁ nityaṁ tuṣhyanti cha ramanti cha Audio भावार्थ: निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) […]
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Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 8
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते |इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: || 8|| ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartateiti matvā bhajante māṁ budhā bhāva-samanvitāḥ Audio भावार्थ: मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान् भक्तजन […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 7
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्वत: |सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशय: || 7|| etāṁ vibhūtiṁ yogaṁ cha mama yo vetti tattvataḥso ’vikampena yogena yujyate nātra sanśhayaḥ Audio भावार्थ: जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 6
महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा |मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा: || 6|| maharṣhayaḥ sapta pūrve chatvāro manavas tathāmad-bhāvā mānasā jātā yeṣhāṁ loka imāḥ prajāḥ Audio भावार्थ: सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 5
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश: |भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा: || 5|| ahinsā samatā tuṣhṭis tapo dānaṁ yaśho ’yaśhaḥbhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛithag-vidhāḥ Audio भावार्थ: तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 5
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश: | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा: || 5|| ahinsā samatā tuṣhṭis tapo dānaṁ yaśho ’yaśhaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛithag-vidhāḥ Audio भावार्थ: तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 4
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम: शम: |सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च || 4|| buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥsukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha Audio भावार्थ: निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय Translation From me alone arise […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् |असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते || 3|| yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaramasammūḍhaḥ sa martyeṣhu sarva-pāpaiḥ pramuchyate Audio भावार्थ: जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 2
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय: |अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश: || 2|| na me viduḥ sura-gaṇāḥ prabhavaṁ na maharṣhayaḥaham ādir hi devānāṁ maharṣhīṇāṁ cha sarvaśhaḥ Audio भावार्थ: मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं […]
Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 1
श्रीभगवानुवाच |भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच: |यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || 1|| śhrī bhagavān uvāchabhūya eva mahā-bāho śhṛiṇu me paramaṁ vachaḥyatte ’haṁ prīyamāṇāya vakṣhyāmi hita-kāmyayā Audio भावार्थ: श्री भगवान् बोले- हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की […]
