प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते |प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65|| prasāde sarva-duḥkhānāṁ hānir asyopajāyateprasanna-chetaso hyāśhu buddhiḥ paryavatiṣhṭhate Audio भावार्थ: अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥ Translation By […]
News
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति || 64|| rāga-dveṣha-viyuktais tu viṣhayān indriyaiśh charanātma-vaśhyair-vidheyātmā prasādam adhigachchhati Audio भावार्थ: परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥ Translation But one who controls the mind, and is free from […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 63
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || 63|| krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥsmṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati Audio भावार्थ: क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 62
ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते || 62|| dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyatesaṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate Audio भावार्थ: विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥ Translation While […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 61
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: |वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 61|| tāni sarvāṇi sanyamya yukta āsīta mat-paraḥvaśhe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣhṭhitā Audio भावार्थ: इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित: |इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन: || 60|| yatato hyapi kaunteya puruṣhasya vipaśhchitaḥindriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ Audio भावार्थ: हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं॥60॥ Translation The senses are so […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 59
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: |रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || 59|| viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥrasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate Audio भावार्थ: इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 58
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 58|| yadā sanharate chāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśhaḥindriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣhṭhitā Audio भावार्थ: और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 57
य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् |नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 57|| yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śhubhāśhubhamnābhinandati na dveṣhṭi tasya prajñā pratiṣhṭhitā Audio भावार्थ: जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥57॥ Translation One who remains unattached […]
Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 56
दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: |वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || 56|| duḥkheṣhv-anudvigna-manāḥ sukheṣhu vigata-spṛihaḥvīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir uchyate Audio भावार्थ: दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥56॥ Translation One whose mind remains undisturbed […]
