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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 15

Chapter 2, Verse 15 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || 15|| yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabhasama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate भावार्थ: क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है॥15॥ […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 14

Chapter 2, Verse 14 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा: | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || 14|| mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥāgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata भावार्थ: हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर॥14॥ Translation O son of Kunti, the contact between the […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 13

Chapter 2, Verse 13 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || 2.13 || dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarātathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati भावार्थ: जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 12

Chapter 2, Verse 12 न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा | न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || 2.12 || na tvevāhaṁ jātu nāsaṁ na tvaṁ neme janādhipāḥna chaiva na bhaviṣhyāmaḥ sarve vayamataḥ param भावार्थ: न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 11

Chapter 2, Verse 11 श्रीभगवानुवाच | अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: || 2.11 || śhrī bhagavān uvāchaaśhochyān-anvaśhochas-tvaṁ prajñā-vādānśh cha bhāṣhasegatāsūn-agatāsūnśh-cha nānuśhochanti paṇḍitāḥ भावार्थ: श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 10

Chapter 2, Verse 10 तमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच: || 2.10 || tam-uvācha hṛiṣhīkeśhaḥ prahasanniva bhāratasenayorubhayor-madhye viṣhīdantam-idaṁ vachaḥ भावार्थ: हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले॥10॥ Translation O Dhritarashtra, thereafter, in the midst of both the […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 9

Chapter 2, Verse 9 सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप | न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || 2.9 || sañjaya uvāchaevam-uktvā hṛiṣhīkeśhaṁ guḍākeśhaḥ parantapana yotsya iti govindam uktvā tūṣhṇīṁ babhūva ha भावार्थ: संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 8

Chapter 2, Verse 8 न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || 2.8 || na hi prapaśhyāmi mamāpanudyādyach-chhokam uchchhoṣhaṇam-indriyāṇāmavāpya bhūmāv-asapatnamṛiddhaṁrājyaṁ surāṇāmapi chādhipatyam भावार्थ: क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने […]

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Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 7

Chapter 2, Verse 7 कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: | यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || 2.7 || kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥpṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥyach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanmeśhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam भावार्थ: इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि […]

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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते | सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक् || 18|| drupado draupadeyāśhcha sarvaśhaḥ pṛithivī-patesaubhadraśhcha mahā-bāhuḥ śhaṅkhāndadhmuḥ pṛithak pṛithak भावार्थ: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए॥16॥ष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं […]