सञ्जय उवाच । दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। sañjaya uvāchadṛiṣhṭvā tu pāṇḍavānīkaṁ vyūḍhaṁ duryodhanastadāāchāryamupasaṅgamya rājā vachanamabravīt भावार्थ: संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा॥2॥ Translation Sanjay said: On observing the Pandava army standing in military formation, […]
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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 1
Chapter 1 of the Bhagavad Gita sets the stage for the conversation between Lord Krishna and Arjuna. It describes the battlefield, the opposing armies, and the main characters involved in the battle. The chapter also provides insight into Arjuna’s state of mind as he contemplates the violence and destruction that will result from the battle. […]
Bhagawad Gita Chapter 1 (अर्जुनविषादयोग- नामक पहला अध्याय)
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेभावार्थश्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः। ॥1॥ (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन ) Chapter 1, Verse 1 धृतराष्ट्र उवाच – धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ 1.1 Dhritarashtra said: O Sanjay, after gathering on the holy field of Kurukshetra, and desiring to fight, what […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 1
अर्जुन उवाच | सन्न्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन || arjuna uvāchasannyāsasya mahā-bāho tattvam ichchhāmi veditumtyāgasya cha hṛiṣhīkeśha pṛithak keśhi-niṣhūdana भावार्थ: अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ॥1॥ Translation Arjun said: O mighty-armed Krishna, I wish to understand the nature […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 2
श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदु: | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा: || śhrī-bhagavān uvāchakāmyānāṁ karmaṇāṁ nyāsaṁ sannyāsaṁ kavayo viduḥsarva-karma-phala-tyāgaṁ prāhus tyāgaṁ vichakṣhaṇāḥ भावार्थ: श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के (स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण: | यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे || tyājyaṁ doṣha-vad ity eke karma prāhur manīṣhiṇaḥyajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyam iti chāpare भावार्थ: कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं॥3॥ Translation Some […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 4
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम | त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तित: || niśhchayaṁ śhṛiṇu me tatra tyāge bharata-sattamatyāgo hi puruṣha-vyāghra tri-vidhaḥ samprakīrtitaḥ भावार्थ: हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 5
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् | यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् || yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tatyajño dānaṁ tapaśh chaiva pāvanāni manīṣhiṇām भावार्थ: यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को (वह मनुष्य […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च | कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् || etāny api tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni chakartavyānīti me pārtha niśhchitaṁ matam uttamam भावार्थ: इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 7
नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते | मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित: || niyatasya tu sannyāsaḥ karmaṇo nopapadyatemohāt tasya parityāgas tāmasaḥ parikīrtitaḥ भावार्थ: (निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्म का (इसी अध्याय के श्लोक 48 की टिप्पणी में इसका अर्थ देखना चाहिए।) स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं […]
