अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस: | विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते || ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥviṣhādī dīrgha-sūtrī cha kartā tāmasa uchyate भावार्थ: जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो […]
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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु | प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय || buddher bhedaṁ dhṛiteśh chaiva guṇatas tri-vidhaṁ śhṛiṇuprochyamānam aśheṣheṇa pṛithaktvena dhanañjaya भावार्थ: हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन॥ Translation Hear now, O Arjun, of the distinctions […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 30
प्रवृत्तिंच निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये |बन्धं मोक्षं च या वेत्तिबुद्धि: सा पार्थ सात्विकी || pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhayebandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī भावार्थ: हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 51
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च | शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च || 51|| buddhyā viśhuddhayā yukto dhṛityātmānaṁ niyamya chaśhabdādīn viṣhayāns tyaktvā rāga-dveṣhau vyudasya cha भावार्थ: विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के (इसी […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 52
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस: | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित: || 52|| vivikta-sevī laghv-āśhī yata-vāk-kāya-mānasaḥdhyāna-yoga-paro nityaṁ vairāgyaṁ samupāśhritaḥ भावार्थ: इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने Translation Dwelling in solitude, eating but little, with speech, body and mind subdued, […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 53
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् | विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते || 53|| ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ parigrahamvimuchya nirmamaḥ śhānto brahma-bhūyāya kalpate भावार्थ: करण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च | अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी || yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva chaayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī भावार्थ: हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है॥31॥ Translation The intellect is […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता | सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी || adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitāsarvārthān viparītānśh cha buddhiḥ sā pārtha tāmasī भावार्थ: हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी ‘यह धर्म है’ ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 33
धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया: | योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्विकी || dhṛityā yayā dhārayate manaḥ-prāṇendriya-kriyāḥyogenāvyabhichāriṇyā dhṛitiḥ sā pārtha sāttvikī भावार्थ: हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह ‘अव्यभिचारिणी धारणा’ है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा […]
Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 34
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन | प्रसङ्गेन फलाकाङ् क्षी धृति: सा पार्थ राजसी || yayā tu dharma-kāmārthān dhṛityā dhārayate ‘rjunaprasaṅgena phalākāṅkṣhī dhṛitiḥ sā pārtha rājasī भावार्थ: परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है॥34॥ Translation […]
