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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 45

स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: | स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु || sve sve karmaṇy abhirataḥ sansiddhiṁ labhate naraḥsva-karma-nirataḥ siddhiṁ yathā vindati tach chhṛiṇu भावार्थ: अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 46

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: || yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatamsva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ भावार्थ: जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है (जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitātsvabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham भावार्थ: अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता॥47॥ Translation It is better […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् |सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: || saha-jaṁ karma kaunteya sa-doṣham api na tyajetsarvārambhā hi doṣheṇa dhūmenāgnir ivāvṛitāḥ भावार्थ: अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 49

असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह: |नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति || asakta-buddhiḥ sarvatra jitātmā vigata-spṛihaḥnaiṣhkarmya-siddhiṁ paramāṁ sannyāsenādhigachchhati भावार्थ: सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है॥49॥ Translation Those whose intellect is unattached everywhere, who have mastered the mind, and are free from desires by the practice […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 50

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे |समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा || siddhiṁ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha mesamāsenaiva kaunteya niṣhṭhā jñānasya yā parā भावार्थ: जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 54

ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ् क्षति |सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् || brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śhochati na kāṅkṣhatisamaḥ sarveṣhu bhūteṣhu mad-bhaktiṁ labhate parām भावार्थ: फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 55

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वत: |ततो मां तत्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् || bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaśh chāsmi tattvataḥtato māṁ tattvato jñātvā viśhate tad-anantaram भावार्थ: उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 56

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: |मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् || sarva-karmāṇy api sadā kurvāṇo mad-vyapāśhrayaḥmat-prasādād avāpnoti śhāśhvataṁ padam avyayam भावार्थ: मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है॥56॥ Translation My devotees, though performing all kinds of actions, take full refuge in me. […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 57

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: |बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव || chetasā sarva-karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥbuddhi-yogam upāśhritya mach-chittaḥ satataṁ bhava भावार्थ: सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो॥57॥ Translation Dedicate your […]