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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 58

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |अथ चेत्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि || mach-chittaḥ sarva-durgāṇi mat-prasādāt tariṣhyasiatha chet tvam ahankārān na śhroṣhyasi vinaṅkṣhyasi भावार्थ: उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 59

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे |मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति || yad ahankāram āśhritya na yotsya iti manyasemithyaiṣha vyavasāyas te prakṛitis tvāṁ niyokṣhyati भावार्थ: जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा॥59॥ Translation If, […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 60

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा |कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् || swbhāva-jena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇākartuṁ nechchhasi yan mohāt kariṣhyasy avaśho ’pi tat भावार्थ: हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा॥60॥ Translation O Arjun, that action which out of […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 61

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति |भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया || īśhvaraḥ sarva-bhūtānāṁ hṛid-deśhe ‘rjuna tiṣhṭhatibhrāmayan sarva-bhūtāni yantrārūḍhāni māyayā भावार्थ: हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है॥61॥ Translation The Supreme Lord dwells in the hearts […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् tam eva śharaṇaṁ gachchha sarva-bhāvena bhāratatat-prasādāt parāṁ śhāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śhāśhvatam भावार्थ: हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया |विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayāvimṛiśhyaitad aśheṣheṇa yathechchhasi tathā kuru भावार्थ: इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥63॥ Translation Thus, I have explained […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 64

सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु मे परमं वच: |इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् || sarva-guhyatamaṁ bhūyaḥ śhṛiṇu me paramaṁ vachaḥiṣhṭo ‘si me dṛiḍham iti tato vakṣhyāmi te hitam भावार्थ: संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 65

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे || man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskurumām evaiṣhyasi satyaṁ te pratijāne priyo ‘si me भावार्थ: हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: || sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vrajaahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ भावार्थ: संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना […]

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Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 67

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन |न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति || idaṁ te nātapaskyāya nābhaktāya kadāchanana chāśhuśhruṣhave vāchyaṁ na cha māṁ yo ‘bhyasūtayi भावार्थ: भावार्थ : तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में […]