यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् |यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: || 11|| yatanto yoginaśh chainaṁ paśhyanty ātmany avasthitamyatanto ‘py akṛitātmāno nainaṁ paśhyanty achetasaḥ Audio भावार्थ: यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस […]
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Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 10
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् |विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: || 10|| utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitamvimūḍhā nānupaśhyanti paśhyanti jñāna-chakṣhuṣhaḥ Audio भावार्थ: शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 9
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते || 9|| śhrotraṁ chakṣhuḥ sparśhanaṁ cha rasanaṁ ghrāṇam eva chaadhiṣhṭhāya manaśh chāyaṁ viṣhayān upasevate Audio भावार्थ: यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है॥9॥ Translation Using the […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 8
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर: |गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् || 8|| śharīraṁ yad avāpnoti yach chāpy utkrāmatīśhvaraḥgṛihītvaitāni sanyāti vāyur gandhān ivāśhayāt Audio भावार्थ: वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: |मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || 7||/h2> mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥmanaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati Audio भावार्थ: इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है (जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 6
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: |यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || 6|| na tad bhāsayate sūryo na śhaśhāṅko na pāvakaḥyad gatvā na nivartante tad dhāma paramaṁ mama Audio भावार्थ: जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 5
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा: |द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् || 5|| nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣhāadhyātma-nityā vinivṛitta-kāmāḥdvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-sanjñairgachchhanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat Audio भावार्थ: जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 4
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यंयस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येयत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4|| tataḥ padaṁ tat parimārgitavyaṁyasmin gatā na nivartanti bhūyaḥtam eva chādyaṁ puruṣhaṁ prapadyeyataḥ pravṛittiḥ prasṛitā purāṇī Audio भावार्थ: उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 3
न रूपमस्येह तथोपलभ्यतेनान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्वा || 3|| na rūpam asyeha tathopalabhyatenānto na chādir na cha sampratiṣhṭhāaśhvattham enaṁ su-virūḍha-mūlamasaṅga-śhastreṇa dṛiḍhena chhittvā Audio भावार्थ: इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता (इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है […]
Bhagavad Gita: Chapter 15, Verse 2
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखागुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला: |अधश्च मूलान्यनुसन्ततानिकर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके || 2|| adhaśh chordhvaṁ prasṛitās tasya śhākhāguṇa-pravṛiddhā viṣhaya-pravālāḥadhaśh cha mūlāny anusantatānikarmānubandhīni manuṣhya-loke Audio भावार्थ: उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन […]
