ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च |शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च || 27|| brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya chaśhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha Audio भावार्थ: क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ॥27॥ Translation I am the basis of the formless Brahman, the immortal and imperishable, […]
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Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते || 26|| māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevatesa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate Audio भावार्थ: और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: |सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते || 25|| mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥsarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate Audio भावार्थ: जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है॥25॥ Translation who remain the same in […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 24
समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन: |तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति: || 24|| sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥtulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ Audio भावार्थ: जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है॥24॥ Translation Those who are alike […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 23
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते |गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते || 23|| udāsīna-vad āsīno guṇair yo na vichālyateguṇā vartanta ity evaṁ yo ’vatiṣhṭhati neṅgate Audio भावार्थ: जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते (त्रिगुणमयी माया से उत्पन्न हुए अन्तःकरण सहित इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 22
श्रीभगवानुवाच |प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव |न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ् क्षति || 22| śhrī-bhagavān uvāchaprakāśhaṁ cha pravṛittiṁ cha moham eva cha pāṇḍavana dveṣhṭi sampravṛittāni na nivṛittāni kāṅkṣhati Audio भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश (अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 21
अर्जुन उवाच |कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो |किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || 21|| arjuna uvāchakair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabhokim āchāraḥ kathaṁ chaitāns trīn guṇān ativartate Audio भावार्थ: अर्जुन बोले- इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् |जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्रुते || 20|| guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavānjanma-mṛityu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛitam aśhnute Audio भावार्थ: ह पुरुष शरीर की (बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय- इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 19
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति || 19|| nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyatiguṇebhyaśh cha paraṁ vetti mad-bhāvaṁ so ’dhigachchhati Audio भावार्थ: जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह […]
Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: |जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा: || 18|| ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥjaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ Audio भावार्थ: सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि […]
