Chapter 2, Verse 1 सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: || 2.1|| sañjaya uvāchataṁ tathā kṛipayāviṣhṭamaśhru pūrṇākulekṣhaṇamviṣhīdantamidaṁ vākyam uvācha madhusūdanaḥ भावार्थ: संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा॥1॥ Translation Sanjay said: Seeing Arjun […]
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Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 47
सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: || 47| sañjaya uvāchaevam uktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśhatvisṛijya sa-śharaṁ chāpaṁ śhoka-saṁvigna-mānasaḥ भावार्थ: संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए॥47॥ Translation Sanjay said: Speaking thus, Arjun cast […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: | धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || 46|| yadi mām apratīkāram aśhastraṁ śhastra-pāṇayaḥdhārtarāṣhṭrā raṇe hanyus tan me kṣhemataraṁ bhavet भावार्थ: यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा॥46॥ Translation It […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: || 45|| aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayamyad rājya-sukha-lobhena hantuṁ sva-janam udyatāḥ भावार्थ: हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं॥45॥ […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन | नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम || 44|| utsanna-kula-dharmāṇāṁ manuṣhyāṇāṁ janārdananarake ‘niyataṁ vāso bhavatītyanuśhuśhruma भावार्थ: हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं॥44॥ Translation O Janardan (Krishna), I have heard from the learned that those who destroy family traditions […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 43
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: | उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: || 43|| doṣhair etaiḥ kula-ghnānāṁ varṇa-saṅkara-kārakaiḥutsādyante jāti-dharmāḥ kula-dharmāśh cha śhāśhvatāḥ भावार्थ: इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं॥43॥ Translation Through the evil deeds of those who destroy the family tradition and thus give rise to unwanted progeny, a variety of […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 42
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च | पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || 42|| saṅkaro narakāyaiva kula-ghnānāṁ kulasya chapatanti pitaro hy eṣhāṁ lupta-piṇḍodaka-kriyāḥ भावार्थ: वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: | स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: || 41|| adharmābhibhavāt kṛiṣhṇa praduṣhyanti kula-striyaḥstrīṣhu duṣhṭāsu vārṣhṇeya jāyate varṇa-saṅkaraḥ भावार्थ: भावार्थ : हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥41॥ Translation With the preponderance of […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना: | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || 40|| kula-kṣhaye praṇaśhyanti kula-dharmāḥ sanātanāḥdharme naṣhṭe kulaṁ kṛitsnam adharmo ’bhibhavaty uta भावार्थ: कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है॥40॥ Translation When a dynasty is destroyed, its […]
Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 39
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन || 39|| kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitumkula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ prapaśhyadbhir janārdana भावार्थ: यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष […]
