यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते |सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते || 33|| yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyatesarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate Audio भावार्थ: जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता॥32॥ Translation Space holds everything within […]
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Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 32
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: |शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || 32|| anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥśharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate Audio भावार्थ: हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है॥31॥ Translation The Supreme […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 31
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति |तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || 31|| yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyatitata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā Audio भावार्थ: जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 30
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश: |य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति || 30|| prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥyaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati Audio भावार्थ: और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है॥29॥ Translation They alone truly […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 29
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् |न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || 29|| samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaramna hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim Audio भावार्थ: क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है॥28॥ Translation Those, […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 28
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् |विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति || 28|| samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaramvinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati Audio भावार्थ: क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है॥28॥ Translation They alone truly […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 27
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्वं स्थावरजङ्गमम् |क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || 27|| yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamamkṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha Audio भावार्थ: हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान॥26॥ Translation O best of the Bharatas, whatever moving or unmoving being you see in existence, know […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 26
अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते |तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: || 26|| anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsatete ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ Audio भावार्थ: परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 25
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना |अन्ये साङ् ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे || 25|| dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanāanye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare Audio भावार्थ: स परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान (जिसका वर्णन गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य […]
Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 24
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणै: सह |सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते || 24|| ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ sahasarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate Audio भावार्थ: इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से […]
