अर्जुन उवाच |स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्याजगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्तिसर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा: || 36|| arjuna uvāchasthāne hṛiṣhīkeśha tava prakīrtyājagat prahṛiṣhyaty anurajyate charakṣhānsi bhītāni diśho dravantisarve namasyanti cha siddha-saṅghāḥ Audio भावार्थ: अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है […]
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Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 35
सञ्जय उवाच |एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्यकृताञ्जलिर्वेपमान: किरीटी |नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीत: प्रणम्य || 35|| सञ्जय उवाच |एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्यकृताञ्जलिर्वेपमान: किरीटी |नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीत: प्रणम्य || 35|| Audio भावार्थ: संजय बोले- केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 34
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं चकर्णं तथान्यानपि योधवीरान् |मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् || 34|| droṇaṁ cha bhīṣhmaṁ cha jayadrathaṁ chakarṇaṁ tathānyān api yodha-vīrānmayā hatāṁs tvaṁ jahi mā vyathiṣhṭhāyudhyasva jetāsi raṇe sapatnān Audio भावार्थ: द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 33
तस्मात्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्वजित्वा शत्रून्भुङ् क्ष्व राज्यं समृद्धम् |मयैवैते निहता: पूर्वमेवनिमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् || 33| tasmāt tvam uttiṣhṭha yaśho labhasvajitvā śhatrūn bhuṅkṣhva rājyaṁ samṛiddhammayaivaite nihatāḥ pūrvam evanimitta-mātraṁ bhava savya-sāchin Audio भावार्थ: अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 32
श्रीभगवानुवाच |कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त: |ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वेयेऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा: || 32|| śhrī-bhagavān uvāchakālo ’smi loka-kṣhaya-kṛit pravṛiddholokān samāhartum iha pravṛittaḥṛite ’pi tvāṁ na bhaviṣhyanti sarveye ’vasthitāḥ pratyanīkeṣhu yodhāḥ Audio भावार्थ: श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 31
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद |विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् || 31|| ākhyāhi me ko bhavān ugra-rūponamo ’stu te deva-vara prasīdavijñātum ichchhāmi bhavantam ādyaṁna hi prajānāmi tava pravṛittim Audio भावार्थ: मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 30
लेलिह्यसे ग्रसमान: समन्ता-ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भि: |तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो || 30|| lelihyase grasamānaḥ samantāllokān samagrān vadanair jvaladbhiḥtejobhir āpūrya jagat samagraṁbhāsas tavogrāḥ pratapanti viṣhṇo Audio भावार्थ: आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगा: |तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा: || 29|| yathā pradīptaṁ jvalanaṁ pataṅgāviśhanti nāśhāya samṛiddha-vegāḥtathaiva nāśhāya viśhanti lokāstavāpi vaktrāṇi samṛiddha-vegāḥ Audio भावार्थ: जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 28
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा:समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति |तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति || 28|| yathā nadīnāṁ bahavo ’mbu-vegāḥsamudram evābhimukhā dravantitathā tavāmī nara-loka-vīrāviśhanti vaktrāṇy abhivijvalanti Audio भावार्थ: जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश […]
Bhagavad Gita: Chapter 11, Verse 27
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्तिदंष्ट्राकरालानि भयानकानि |केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषुसन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै: || 27|| vaktrāṇi te tvaramāṇā viśhantidanṣhṭrā-karālāni bhayānakānikechid vilagnā daśhanāntareṣhusandṛiśhyante chūrṇitair uttamāṅgaiḥ Audio भावार्थ: और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों […]
